अनंत चतुर्दशी पर विशेष
भारतीय संस्कृति में लोकनेता लोकमान्य तिलक ने गणेशजी की भक्ति और शक्ति के संयोग से स्वराज्य के विचारशील सिपाही बनाने का संकल्प लिया। सन् 1893-94 में लोकमान्य तिलक ने गणोशोत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिकता प्रदान की। इसी प्रभाव से इन्दौर में भी गणोशोत्सव सन् 1896 से शुभारंभ हुआ। कृष्णपुरा पुल के पश्चिमी किनारे पर बनी राजाओं की छत्री के आखरी छोर पर भगवान दत्तात्रय का प्राचीन मंदिर है। उस जमाने में नदी में लबालब जल भरा होता था। घाट की साफ सीढ़ियों पर पढ़े-लिखे लोग, प्रकृति प्रेमी और धर्म प्रेमी जनसमूह एकत्र होते थे। इन्हीं समूहों में होल्कर कॉलेज के देशभक्त प्रोफेसर व विद्यार्थियों का भी एक समूह था। अन्य विद्यार्थी भी आते थे।
इस समूह ने दत्त समाज, ज्ञान प्रसारक मंडल आदि के नाम से इन्दौर में भी गणेशोत्सव को राष्ट्रीयता में सराबोर कर दिया। कार्यक्रमों में वीररस के पोवाड़े, ऐतिहासिक नाटक तथा मुख्य रूप से व्याख्यान होते थे। जनता केा यह समझाया जाता था कि, हमें स्वतंत्र होने के लिए एक होकर क्रूर अंग्रेजी शासन से मुकाबला करना है। गणोशोत्सव के इन सूत्रधारों में उस जमाने के इन्दौर के क्रांतिकारी नेताभाई कोतवाल, पुरूषोत्तम खंाडेकर, आवास खरे, बाबू भैया नेवासकर तथा विनायक सीताराम सरवटे आदि थे। (बाद में तात्या सरवटे संविधान सभा के सदस्य व राज्यसभा के सदस्य भी बने, सरवटे बस स्टेण्ड उन्हीं की स्मृति दिला रहा है) कृष्णपुरा दत्त मंदिर के प्रांगण में तथा ज्ञान प्रसारक मंडल के वाचनालय के पास दामुअण्णा होटल में भजन, राष्ट्रीय गीत, व्याख्यान होते थे। सन् 1905 में लार्ड कर्जन द्वारा हिन्दू-मुसलमानों में स्थाई फूट का बीजारोपण किया गया, बंगाल का विभाजन करके। लार्ड कर्जन की इस नीति का देश व्यापी विरोध हुआ। इन्दौर भी इस विरोध में शामिल रहा। सन् 1908 का गणेशोत्सव सारे शहर में सनसनी पैदा करने वाला सिद्ध हुआ। लोकमान्य तिलक पर चल रहे मुकदमें का 31 जून 1908 को फैसला हुआ। उन्हें 6 वर्ष की कालेपानी की सजा सुनाई गई। जनता में इसका सर्वत्र विरोध हुआ। इसलिए इन्दौर में मनाया गया सन् 1908 का गणेशोत्सव सबसे बड़ा राज्यद्रोह माना गया।
(मदन परमालिया)
सामाजिक कार्यकर्ता
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इन्दौर के महाराजा तुकोजीराव होलकर तृतीय के राज्याधिकार उन दिनों स्थगित थे। रिजेंसी कौंसिल होलकर राज्य पर काबिज थी। दिल्ली के वाइसराय के निर्देशन पर कौंसिल काम करती थी। देश के अन्य भागों में फैल रही राष्ट्रीय जागृति की खबरों और लोकमान्य तिलक को दी गई सजा से इन्दौर के जागरूक युवकों की विद्रोही भावना देखकर आंदोलनों व गणोशोत्सव पर पाबंदी लगा दी गई। रिजेंसी कौंसिल ने वाइसराय को दिल्ली भेजी गई रिपोर्ट में लिखा -
सन् 1908 में राज्यद्रोह घोषणा
इन्दौर के कुछ विद्याभ्यासी युवक स्वेच्छाचारी बन गए हैं। उन्हें जगह-जगह सभाऐं करते हुए शिवाजी जयंती और गणोशोत्सव मनाते हुए देखा गया है। इन युवकों ने अलग-अलग नाम से संगठन बनाए हुए हैं। इनके काम भी अलग-अलग है। अलग-अलग तरह की प्रार्थना की जाती है और गीत भी गाए जाते हैं। कलकत्ता व पूना में चल रहे ब्रिटिश राज्य द्रोह के आंदोलनांे की हवा यहां (इन्दौर) भी फैल रही है। इसलिए प्रतिबंध लगाया गया है।
रिजेंसी कौंसिल के दमनात्मक रवैये से जन-मानस बदला हुआ था। जनता ने ज्यादा जोश-खरोश के साथ इमली बाजार स्थित बालाजी मंदिर के सभागृह में गणोशोत्सव मनाया। (आजकल इस मंदिर की जगह काम्पलेक्स की दुकानें है) बालाजी मंदिर के सभागृह में 500 व्यक्ति बैठ सकते थे, महिलाओं के लिए उपर गैलरी भी बनी थी। इस सभागृह में श्रावण महीने या अन्य दिनों में नाटक, कथा-किर्तन होते रहे या विवाह-शादी। बालाजी मंदिर के इस उत्सव के प्रमुख होलकर कॉलेज के प्राध्यापक श्री गोखले तथा 2 अन्य विद्यार्थियों को राज्य-बदर कर दिया गया। दि. 5 अक्टूबर 1908 को राजकीय गजट में इन्दौर पीनल कोर्ट की धारा 174 (ए) के अंतर्गत इस उत्सव को अवैध घोषित कर दिया गया। प्रो. गोखले फिजिक्स के विद्वान थे। जब महाराजा तुकोजीराव होलकर को राज्याधिकार प्राप्त हुए तो उन्होंने अमरीका से बुलाकर प्रो. गोखले को पुनः नियुक्ति दी।
रिजेंसी कौसिल द्वारा ‘‘दरबार-प्रस्ताव‘‘ में भी गणेशोत्सव को राजद्रोह माना गया। इसी वर्ष जनता ने गणेश प्रतिमाओं का सामूहिक जुलूस निकालकर विसर्जन करने का निश्चय किया। मोहल्ले-मोहल्ले से गणेशजी की प्रतिमा जुलूस के रूप में कृष्णपुरा बोझाकोट प्रांगण में एकत्रित हुई। झांझ, मजीरे, ढ़ोलक, लेझिम और करताल बजाते हुए लोग गणेशजी की जय-जयकार कर रहे थे। जगह-जगह पुलिस तैनात थी। अंग्रेज आई.जी.पी.मि. सीग्रिम बदहवास सा घूम रहा था। इससे विसर्जन जुलूस में ज्यादा जोश था। जुलूस में कभी-कभी अंग्रेज विरोधी नारे लग जाते थे।
गणपति बप्पा मौर्या, स्वराज घेऊनी लवकर या गणपति उत्सव के दिनों में ही डोल ग्यारस पर फूल डोल का महान त्यौहार आता है। मंदिरों से भगवान राधा-कृष्ण के सज्जित हो निकलते है। सन् 1908 में डोल ग्यारस के दिन ही महा. तुकोजीराव तृतीय के यहां श्रीमंत महाराजा यशवंतराव होलकर (आधुनिक इन्दैर के निर्माता) का जन्म हुआ। ज्ञान प्रसारक मंडल व दत्त समाज के कार्यकर्ताओं ने रिजेंसी कौंसिल से राजपुत्र अभिनंदन समारोह मनाने के लिए एडवर्ड हाल (वर्तमान गंाधीहाल सन् 1948 में 30 जनवरी को महात्मा गांधी के बलिदान पर आयोजित शोकसभा में महाराजा यशवंतराव होलकर ने स्वयं एडवर्ड हाल (टाऊन हाल) को गांधीजी की स्मृति में गांधी हाल घोषित किया) का उपयोग करने के लिए शासन को अर्जी दी गई। राज्य भक्ति के बहाने जनता की राष्ट्रभक्ति को उत्तेजित आंदोलित रखने के आयोजन की आज्ञा देने से इंकार कर दिया तो जनता का क्रोध बढ़ गया। जनता ने चुनौती स्वरूप माणिक चौक मैदान (वर्तमान सिकुड़ा हुआ सुभाष चौक) में पहली आमसभा की। इस सभा में वक्ताओं ने कहा कि, अंग्रेज देश पर इतने हावी है कि, हमारे राजा के यहां जन्मे राजकुमार का जन्मदिन मनाने के लिए राज्य संपत्ति का प्रतीक टाउन हाल नहीं दिया गया। हमारे राजा के अधिकार छीनकर आज अंग्रेज हमें हर तरह से सता रहे हैं।
रिजेंसी कौंसिल के कठोर कानून और दमन के कारण 2 वर्षो तक गणेशोत्सव मनाया ही नही जा सका। सन् 1911 में वाइसराय ने रिजेंसी कौंसिल को समाप्त कर दिया और महाराजा तुकोजीराव होलकर को सभी राज्याधिकार लौटा दिए। रिजेंसी कौंसिल की मुर्दाबादी पर इन्दौर की जनता में खूब-खुशियां मनाई गई। महाराजा तुकोजीराव और यशवंतराव होलकर के चिरायू होने के नारे लगाये गये। वंदे मातरम् भी जोश के साथ गुंजाया गया और इन्कलाब जिंदाबाद भी।
गणोशोत्सव से जन्मा अहिल्योत्सव
जनता की राष्ट्रभक्ति व राज्य भक्ति देखकर महाराजा तुकोजीराव ने चंदावरकर को राज्य का दीवान नियुक्त कर दिया। जनता की खुशियां दुगनी हो गई और फिर से उत्सव की धूम-धाम होने लगी। सन् 1915 में इन्हीं जागरूक कार्यकर्ताओं ने विचार किया कि, कोई ऐसा क्षेत्रीय उत्सव मनाया जाये, जिसमें अंग्रेज अधिकारी बाधक न बनें। सभी ने विचार विमर्श के बाद अहिल्योत्सव मनाने का निश्चय किया।
1922 के बाद गणेशोत्सव अलग-अलग मोहल्लों में मनाया जाने लगा। इमली बाजार, गांधी रोड़ रामप्याउ के सामने स्थित दामुअण्णा उपहार गृह, मल्हारगंज में स्व. गवारीकर का बाड़ा, कृष्णपुरा दत्तात्रय मंदिर, आड़ा बाजार में मल्हारराव होल्कर का बाड़ा, व अनंतनारायण मंदिर तथा कंुवर मंडली में खुटाल साहब के बाड़े में गणेशोत्सव होने लगा। मर मिटने की भावना उत्पन्न करने वाले गीत, प्रहसन, समूह गान के साथ शास्त्रीय संगीत, प्रवचन व राष्ट्रीय आंदोलन पर भाषण होते थे। गणेशोत्सव को विशेष रूप से महाराष्ट्रीयन समाज ने उत्तेजना दी, अतः मराठी कार्यक्रम अधिक होते थे। मराठी भाषा-भाषी जनता की बसाहट जेलरोड़ तोपखाना, स्नेहलतागंज, कृष्णपुरा, नंदलालपुरा, जूना तुकोगंज, आदि में अधिक होने के कारण गणेशोत्सव के कार्यक्रम शालीनता से व्यवस्थित हो सकें। इसके लिए सभागृह बनाने का निर्णय लिया गया। परिणामस्वरूप जेलरोड़, स्नेहलतागंज में गणेश मंडल भवन की स्थापना महारानी चन्द्रावती द्वारा की गई।
इन्दौर के गणेशोत्सव में शास्त्रीयता
स्व. माधवराव कुटाल (जो नगर निगम में 30 वर्ष पार्षद रहे) ने बताया था कि, कुंवर मंडली स्थित हमारे बाड़े में गणेशोत्सव में संगीत सम्राट उस्ताद रज्जब अली खां, धु्रपद गायक केशवराव आपटे व रामू भैया का शास्त्रीय संगीत गंूजता था। झांसी की रानी नाटक भी हमारे यहां खेला गया। हमारे उत्सव में एक दिन हरीजन दिवस के रूप में मनाया जाता था। उन दिनों में आड़ा बाजार की हर छोटी-बड़ी दुकान पर छोटे-छोेटे खिलोने की सुंदर-सुंदर गणेश झांकिया सजाई जाती थी।
गणेशोत्सव की सार्वजनिकता का शहरी माहौल इन्दौर की कपड़ा मिलों में भी निर्मित हुआ। मिल मजदूरांे ने स्वयं के चंदे से गणेश स्थापना और जुलूस की शुरूआत की। मिलों में भी कई कार्यक्रम होते थे, परंतु मजदूरों को सबसे ज्यादा अच्छा कार्यक्रम लगता था राम दंगल का। जिसमें सीधे सरल शब्दों में राष्ट्रीय नेताओं की महानता, अंग्रेजी की क्रुरता और शहीदों की प्रशंसा में गीत गाये जाते थे। सन् 1942 से 1946 तक भारत छोड़ों आंदोलन में इन्दौर प्रजा मंडल व कांग्रेस के सभी नेता जेलों में बंद थे। तब इन राम दंगल के गीतों ने ही इन्दौर में राष्ट्रीय चेतना जगाई रखी।
पहला विसर्जन जुलूस
सन् 1924 में हुकुमचंद मिल के मेनेजर स्व. पंत वैद्य साहेब ने सक्रिय भाग लेकर पहली बार विसर्जन जुलूस निकाला। इस जुलूस में केवल 4 गैसबत्ती, 2 बैंडवाले तथा 2 बग्गियां (विक्टोरिया) थी। शंख-घड़ियाल, मजीरे-ढ़ोलक बजाते मजदूर चल रहे थे। अब तो इन्दौर की कपड़ा मलों से निकलने वाले गणेश विसर्जन जुलूस नयानाभिराम विद्युत चलित झांकियों के कारण देशभर में प्रसिद्ध हैं।
1935 का एक्ट पास जाने और प्रांतों में चुनी हुई सरकार बनाने की घोषणा के बाद 11 प्रांतों में कांग्रेसी सरकारें स्थापित होने से गणेशोत्सव धूमधाम से मनाए गए। सन् 1939 में द्वितीय महायुद्ध शुरू हो जाने के कारण कानून की कठोरता में गणेशोत्सव भी सिमट गया। सन् 1945 में युद्ध बंद होने व 1 सितंबर 1946 को देश में अंतरिम सरकार स्थापित होने की खुशियों ने गणेशोत्सव की संख्या में खूब वृद्धि कर दी। आजादी के बाद तो गणेशोत्सव की लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही।
पिछले 50 वर्षो से इन्दौर के गणेश विसर्जन की झाकियां तो अपना गौरव देशभर में बढ़ा रही हैं, परंतु उत्सव के नाम पर मोहल्लों में होने वाले रात्रि कार्यक्रमों के प्रति जनता में निरंतर अरूचि बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है कि, शहर में दुर्गोत्सव दिन दूने हो रहे हैं क्योंकि इसमें भाग लेने वाले कलाकर बालिकाए मोहल्ले में ही रहती हैं और सज-धज कर गरबे में आ जाती हैं। गरबे और गरबा नाटिका के अलावा कोई कार्यक्रम इसमें नहीं होता। गणेशोत्सव के कार्यक्रमों में सधाुर करके इसे पुनः राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रोत्थान की प्रेरणा देने वाला उत्सव बनाये जाने की जरूरत हैं।
हुकुमचंद मिल को श्रेय है, प्रथम उत्सव मनाने
और विर्सजन जुलूस निकालने का
सन् 1915 से 1925 तक इन्दौर शहर में गणेशोत्सव का क्षेत्र तोपखाना, जेलरोड़, जेलरोड़ की हर गली, लोधी मोहल्ला, काछी मोहल्ला, गणेश मंडल और जगन्नाथ विद्यालय, सिख मोहल्ला में बढ़ते-बढ़ते गणेश मंडल स्नेहलतागंज, जगन्नाथ छात्रालय तक सांस्कृतिक प्रतिभा और कला-प्रदर्शन की प्रयोगशाला बना ही रहा। उत्सवों में लावनी पोवाड़े, नाट्य संगीत और व्याख्यानों के माध्यम से जन-जागृति की मशाल जलती रही। इसके बाद सन् 1924-25 में ऋद्धि-सिद्धि के साथ बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश का पदार्पण श्रमिक बस्तियों और कपड़ा मिलों में हुआ, जिसका कीर्तिमान स्थापित करती रही है - कपड़ा मिलों द्वारा निकाली जाने वाली शानदार श्री गणेश विसर्जन जुलूस की अनूठी स्वचलित झाकियां।
सन् 1925-26 में हुकुमचंद मिल के कर्मचारी जेलरोड़वासी मोरेश्वर (मौरू भैया) पुराणिक ने मिल के अहाते में ही मिल मजदूरों के स्वेच्छिक सहयोग से गणेशोत्सव का श्रीगणेश किया। 20-25 श्रद्धालु श्रमिकों ने पूर्ण आस्था से गणेश प्रतिमा झांझ, मंजीरों की ध्वनि के साथ लाकर स्थापित की गई। कोई विशेष कार्यक्रम नहीं होता परंतु मिल के श्रमिक मध्यांतर में गणेश प्रतिमा के पास एकत्र होते है। मौरू भैया पुराणिक उन्हें शहर के जेलरोड़, रामबाग, सुनारवाड़ा, गणेश मण्डल आदि में होने वाले कार्यक्रमों की रोचक जानकारियां देते। उस जमाने में मिल के अधिकारी श्री पंथ वैद्य (जिनकी स्मृति में गणेशोत्सव मनाने वाली प्रसिद्ध पंथ वैद्य कालोनी विख्यात है) साहब ने उत्सव को भजन-कीर्तन से जोड़ा। उन्हीं की प्रेरणा से सन् 1927 में हुकुमचंद मिल के समाजसेवी श्रमिकों ने ‘‘श्रीगणेश विसर्जन जुलूस‘‘ का बीजारोपण किया। यही विशाल वटवृक्ष के समान कपड़ा मिलों से निकलने वाली झाकियों के रूप में हम सब वर्षो से अनंत चतुर्दशी त्यौहार पर देखते हैं। मिलें बंद होने से जुलूस की चमक फिकी पड़ गई। पिछले 2-3 वर्षो से नगर निगम विकास प्राधिकरण, विन विभाग अन्य विभाग भी झाकियां निकाल रहे हैं।
गणेश विसर्जन का पहला जुलूस
सन् 1926-27 में हुकुमचंद मिल ने ही सौभाग्य प्राप्त किया है - श्री गणेश विसर्जन जुलूस निकालने का। मिलों का पहला जुलूस दिन को तीन बजे हुकुमचंद मिल गेट से मैनेजर श्री पंत वैद्य साहब के सुयोग से निकला। मिल के श्रमिक भी शंख, घंटाल, झाँझ, मजीरे,करताल लेकर जुलूस में शामिल हो गए। लगभग 400 श्रद्धालु श्रमिकों ने भक्ति भाव से चल रहे इस जुलूस में भगवान श्री गणेश की प्रतिमा ‘बग्घी‘ में विराजमान की थी। बाँस की किमचियों और बाँसों से बग्घी को मंदिर जैसा बनाया गया था। उस पर आम्र पल्लवों के गुच्छे लहरा दिये गये थे। बग्घी का चंवर धारी गजानन गणपति महाराज की जय-जयकार करते। जुलूस में ‘गणपति बप्पा मोर्या पुढ़चा वर्षी (आगामी वर्ष) लवकर या‘ की गंूज हो रही थी। जुलूस यहां से स्वदेशी मिल, रेलवे फाटक पार करके कन्हैयालाल भंडारी मिल (अब होप मिल) से आगे बढ़ता। स्नेहलतागंज से अन्य छोटे-छोटे पारिवारिक गणेश लेकर चलने भक्त भी इसमें शामिल होने लगे। जेलरोड़, तोपखाना (वर्तमान गांधी रोड़ - जेलरोड़ चौराहा) होता हुआ जुलूस कृष्णपुरा पुल पार करके राजबाड़ा पहंुचा वहंा से फ्रुट मार्केट होता हुआ कृष्णपुरा नदी के पश्चिमी तट पर बने प्राचीन गुरूदत्त मंदिर पर पहंुचता। यहां पंडित बालकृष्ण शुक्ल व अन्य पंडितों ने मंत्रोच्चार सहित मूर्ति के विसर्जन की अनुमति दी। उस जमाने में कृष्णपुरा नदी स्वच्छतम जल से लबालब भरी थी। खान (कान्ह) नदीं और सरस्वती नदी के संगम स्थल पर तैराकों ने प्रतिमा को माथे-कांधे पर संभालकर पहंुचाई और संगम में गणेश विर्सजन सम्पन्न हुआ। अन्य-अन्य मोहल्लों, परिवारों, व्यक्तियों ने भी अपनी सुविधाअनुसार गणेश विसर्जन किया। हुकुमचंद के जुलूस को वापस मिल लौटना था, रास्ते में शाम व रात हो जाने की स्थिति में रोशनी के लिए चार गैस बत्त्यिां व कण्डील भी साथ थे। परंतु गणेशजी इन दिनों इस शानदार मिल से नाराज हो गये। अब मिल बंद है।
ऐतिहासिक झाकियों की धरोहर जो भुलाई नहीं जा सकती
इन्दौर शहर का श्रीगणेश विसर्जन जुलूस सारे देश में अपने ढ़ंग का अनोखा जुलूस रहा हैं। बम्बई और पूणे में भगवान गणेश की विशाल मूर्तियों को विसर्जन निकलता हैं। ये मूर्तियां मिट्टी व प्लास्टर ऑफ पेरिस की 8 से 15 फीट उची तक होती है साथ में भजन मंडिलयां होती है वहां गणेशोत्सव के 10 दिवसीय रात्रि कार्यक्रमों पर हजारो-लाखों रूपये खर्च करके विशाल मण्डपों को अत्याधुनिक साधनों से अत्यधिक आकर्षक बनाया जाता है। फिर भी इन्दौर की कपड़ा मिलों द्वारा निकाली जाने वाली चलित झाकियां देशभर में अद्वितीय रही हैं। इन्दौर निवासियों के जितने भी नाते-रिश्तेदार, बाहर शहर-गांव में रहते हैं उन सबको झाकियों की शोभा यात्रा देखने इन्दौर अवश्य आने का आग्रह किया जाता था। ऐसे हजारों लोग बम्बई, दिल्ली, अहमदाबाद, ग्वालियर, भोपाल आदि स्थानों से भी आते थे। उज्जैन, धार, रतलाम, देवास व खरगोन आदि तक के नागरिक और ग्रामीणों की अपार भीड़ इन्हें देखने आती थी। यद्यपि अब कई शहरों उज्जैन, रतलाम, खण्डवा, देवास, धार आदि में भी इन्दौर जैसी ही चलित झाकियां निकलने लगी हैं।
विसर्जन जुलूस की श्रीगणेश झाकियां अनंत चतुर्दशी के बाद तीन दिन तक मिलों में दर्शनार्थ रखी जाने के कारण इन्दौर की 50 प्रतिशत जनता मिलों में जाकर ही अच्छी तरह 10-20 मिनिट खड़ी होकर झाकियां निहारने में अधिक आनंद पा लेती हैं। विसर्जन जुलूस मंे तो धक्के-मुक्के, भागदौड़, धींगा-मस्ती के साथ होने वाले शोरगुल के कारण अधिकांश जनता घबराकर घर पर ही रहना पसंद करती रही हैं। घर के सुनेपन में चोरी-डकैती का खतरा भी तो रहता है। झाकियों के काफी देरी से निकलने के कारण रात 2-2 बजे तक पराये घर या होटलो, फुटपाथों पर बैठे-बैठे हाथ-पांव अकड़ जाते हैं। पानी, पेशाब की परेशानी रहती हैं और नींद की उबासियां भी आने लगती हैं। हर मिल की झांकी ने 1-1, 2-2 घंटे की लेटलाली भी दुखदाई होती रही हैं।
इन्दौर तथा दूर-दूर के लाखों नर-नारी पिछले वर्षो मिलों में श्रीगणेश विसर्जन की विराट शोभायात्रा (जुलूस) की अनुपम, अद्भुत दृश्यावली के साक्षात दर्शन (दूरदर्शन अर्थात् केबल दूर से दर्शन) के लिए खुशी-खुशी अनेक आपदाऐं सारी रात उठाते रहे हैं। भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के ‘गौरव पर्व‘ की अमर कीर्ति के रूप में इन्दौर की आन-बान-शान और पहचान मंे बेजोड़ मजदूरों की ओर से भेंट की गई यह सांस्कृतिक धरोहर हैं। यह परम्परा समाप्त न होने पाये।
गणतंत्र के देयता श्रीगणेश से अभ्यर्थना है। भारतीय आजादी को हर प्रकार के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक संकटों से षडयंत्रों से बचाना। मजदूरों ने इन झाकियों के द्वारा भारतीय धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक महानताओं के साथ राष्ट्र में भी व्याप्त अनाचार, भ्रष्टाचार, लूट, हत्या, साम्प्रदायिक दंगा आदि को राष्ट्रीय कलंक मिटाने के लिए डंके की चोट उन बुराईयों को झाकियों में दर्शाया है। इन झाकियों को झरोखों में बैठे-बैठे निहारने वालों में राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सद्भावना, सर्वधर्म समभाव, सर्वजन हिताय और (बहुजन हिताय नहीं), सर्वजन सुखाय का मंत्र भी झाकियों के द्वारा गंूजाया गया है। अनपढ़, अशिक्षित, निरीक्षर (आज भी साक्षर नहीं हो पाये) माने जाने वाले इन्दौर की कपड़ा मिलों के मेकेनिकल और मशीनरी में ऐसी (मास्टरी) विशेषता का जिंदा जादू दिखाने वालें मजदूरों ने अच्छे-अच्छे बुद्धिवादी, न्यायवादी, विज्ञानवादी (बकवादी) समाज शास्त्री और राजनिति वेत्ताओं को अपनी कला से चमत्कृत कर दिया है।
मिलों की झाकियों में रामायण और महाभारत का चित्रात्मक दर्शन भी प्रेरणापद रहता हैं। राष्ट्रीय आंदोलन के नजारे भी।
राजनिति में अपने तरह का अनूठा तेवर रखने वाले इन्दौर के महान मजदूरों ने इन झाकियों में रामायण और महाभारत के अनेक पावन प्रसंगों के चलित दृश्यों से ज्ञान परोसा है। राम वन गमन, भरत मिलाप, अहिल्योद्वार, धनुष यज्ञ, राम-सीता विवाह, सीता हरण, जटायु वर्ग, भी हनुमान का संजीवनी लाना, राम-रावण युद्ध, रामेश्वरम में शिव पूजन आदि दृश्यों से महान लोक संत, राष्ट्र संत महाकवि, तुलसीजी की रामायण के अनेक प्रसंगों को ‘‘खुली आंखों‘‘ देखेने का कमाल दिखाया है। तुलसी ने जिन भावनाओं को शब्दों की रसमयता प्रदान की है उन सबकों स्वभाविक चरित्र में चत्रित हो चलित किया गया है। मजदूरों के अरमानों, हसरतों और तमन्नाओं ने अपने अनोखें ढ़ंग से तराशा था ‘‘सच्चे लोकोत्सव‘‘ के रूप में श्री गणेशोत्सव को प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता का ढ़ोल पीटने वालों को चुनौती देती है। कपड़ा मजदूरों द्वारा बनाई गई सामाजिक सुधारों की गर्जना करने वाली यह झाकियां मजदूरों को बर्बाद करने वाली तीन बुराईयां हैं। सट्टा, सिनेमा, शराब इन पर कड़ा प्रहार (संदेशातमक-उपदेशात्मक) भी इन झाकियों में खुलेआम किया गया है। मजदूरों में फैली गरीबी, भूखमरी, लाचारगी, बेकारी, बेरोजगारी और छठनी तक के मर्मभेदी करूणामय दृश्य इन झाकियों में देखने को मिले है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, का. विनोबा भावे, लोकमान्य तिलक, सुभाषचंद्र बोस, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, इंदिरा गांधी की कुर्बानियों को दिखाकर इन झाकियों ने राष्ट्रीयता की कीर्ति भी स्थापित की हैं।
नदी के दोनों किनारों पर खड़ें हजारों, हजार नर-नारियों ने जयकार की। सुर्यास्त के पूर्व ही प्रतिमा विसर्जन कर जुलूस के सभी लोग शाम होने के पूर्व ही मिल पहंुचना जरूरी समझते थे क्योंकि ये वह दिन थे जब इन्दौर की सड़कों पर आधे-आधे फर्लांग की दूरी पर ‘सड़क लालटेन‘ लगते थे। तेल कम भरा जाने के कारण रात 8-9 बजे स्वयं बुझ जाते थे।
राय बहादुर सेठ कन्हैयालाल भंडारी मिल प्रबंधकों व कर्मचारियों ने पहली बार सन् 1928 में बैंड-बाजों के साथ जुलूस निकाला। अखाडे़ की लेझिंम पार्टी भी थी और भजन मंडलियां भी जुलूस में थी।
राजकुमार मिल का चमत्कार
सन् 1927-28 में सेठ राजकुमार मिल के द्वारा श्रीगणेशोत्सव में विसर्जन जुलूस की श्रीगणेश प्रतिमा को कुछ विद्युत बल्बों से जगमगाया गया। मिल मैनेजर स्व. श्री अय्यर सा. ने उत्सव को प्रगति पथ पर अग्रसर किया।
झांकी सम्राट श्री मिश्रीलाल वर्मा
राजकुमार मिल ने सन् 1943 में 5 फीट लंबे चूहे पर मिल की श्रीगणेश प्रतिमा की प्रभावशाली झांकी निकाली जिसमें चूहे की बड़ी-बड़ी लाल आंखें चमकती थी। आंखों के श्वेत शाम पटल की जगह लाल-लाल लट्टू लगाये गये थे। यह लट्टू आंख मिचौली खेलते थे, जलते और बंद होते रहते थे। श्रीगणेशजी के मूषकराज चूहे महाराज का ही सारी इन्दौर में बोलबाला हो गया।
आजादी के बाद सन् 1948 मंे श्रमिक नेता व्ही.व्ही. द्रविड़ रामसिंह वर्मा और गंगाराम तिवारीजी का इंटक द्वारा मजदूरों में वर्चस्व बढ़ रहा था। इन्होंने मजदूरों में उत्पन्न इस कलात्मक सांस्कृतिक विकास के प्रयत्न किये। नई-नई कल्पनाओं और भावनाओं से ओत-प्रोत वैचारिकता झांकी में लाई गई। प्लायवुड की कटिंग स्वयं मिल के या अन्य मजदूर ही करते थे और उनकी क्रियाओं के चलायमान रखने की तरकीब भी वे ही सोचते थे। इनमें कोई डिग्रीधारी इंजीनियर या विज्ञान अविष्कारक नहीं था। धीरे-धीरे प्लायवुड की अपेक्षा बाँस, घास-फूँस, पत्तो, डंठलों व लाठियों के सहयोग से मानवीय आकृतियां बनाई जाने लगी। चिंदों-चिथड़ांे और रंगीन धागों से इनके अंग-प्रत्यंग उभारे गऐ। इसके बाद पीली मिट्टी और गोबर-चूना अथवा रंगों से पोता जाने लगा।
सन् 2000-01 से झांकियों के माध्यम से नयापन
वर्तमान में चलित झांकियों में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया है और अब सुसज्जित सर्वसुविधायुक्त झांकियों का निर्माण होने लगा है। जिसमें नये-नये रूप में झांकियों को प्रदर्शित किया जाने लगा। साथ ही विगत 24 वर्षो से फूलों के माध्यम से भी झांकियों का निर्माण प्रारंभ हुआ जिसमें फूलों के द्वारा झांकियों को सज्जित किया जाने लगा। विसर्जन मार्ग पर झांकियों के सम्मान में एवं कलाकारों, अखाड़ों एवं करतब करने वालों के लिए मंचों के माध्यम से उन्हें सम्मानित कर हौसला अफजाई होने लगी। झांकियों के माध्यम से नित नये प्रयोग कर जनता को राष्ट्रीय एकता, सद्भावना देश भर में बनी रहे इस उद्देश्य को लेकर झांकियों का निर्माण लगातार जारी है।







