प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल की कैबिनेट में एक निरंतरता दिखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी मंत्री अपने 100 दिन के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। आर्थिक मामलों को देखते हुए पूर्व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दोबारा वित्त मंत्रालय दिया गया। जिससे भारत के तेज आर्थिक विकास की राह में चुनौतियां को जल्द समाप्त किया जा सके। कृषि क्षेत्र में सुधार एक विवादास्पद मुद्दा हैl इसलिए यह मंत्रालय अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दिया है कि वह सबसे सहमति बनाकर इसे लागू कर सकें। श्रम सुधारों को लागू करना भी समय की मांग है अहम मंत्रालयों में वही पुराने चेहरे हैं। यह एक संयोग या राजनीतिक जरूरत नहीं बल्कि स्थिरता और टिकाऊ विकास को लेकर प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है। इस रणनीतिक कदम का मकसद शासन में निरंतरता को आगे बढ़ाते हुए भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लक्ष्य पर तेजी से आगे बढ़ाना है।
शासन के स्तर पर निरंतरता न सिर्फ नीतियों को आसानी से लागू करने में मदद करती है बल्कि इससे उभरती चुनौतियों के समाधान के लिए कदम उठाने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा यह नेतृत्व में बदलाव से जुड़ी बाधाओं को भी कम करती है।
लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिलने के बावजूद कैबिनेट में अनुभवी और जांचे परखे नेतृत्व को शामिल करना यह संकेत देता है कि जटिल चुनौतियों के बीच भारत को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए अनुभवी लोगों की जरूरत है।
प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल भारत में बड़े बदलाव का साक्षी बन सकता है। यह कार्यकाल लोगों को सामाजिक और आर्थिक तौर पर सशक्त बनाते हुए समृद्धि की ओर ले जा सकता है। नरेन्द्र मोदी का अपने अनुभवी मंत्रियों को बनाए रखना यह दिखाता है कि वे पहले के कार्यकाल में हासिल की गई उपलब्धियों को आधार बनाकर उस पर सफलता की इमारत बुलंद करना चाहते हैं। सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भारत के आर्थिक सुधारों और विकास के लिए शुरू की पहलों की गति बनी रहे। इसमें कोई बाधा न आए तो। क्योंकि अब विपक्ष भी बहुत मजबूत है। अब देखने का विषय यह है कि मोदी जी की क्या रणनीति रहती है जिससे वह देश को आर्थिक सुधार, कृषि सुधार, श्रम सुधार, और अपराध मुक्त देश बनाने की दिशा में कितने आगे तक कार्य कर पाते हैं।
